तमिलनाडु की राजनीति में सत्तारूढ़ एम. के. स्टालिन के नेतृत्व वाली द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) और उसकी प्रमुख सहयोगी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) के बीच सीट बंटवारे और प्रतिनिधित्व को लेकर खींचतान की खबरें तेज हो गई हैं। हालांकि दोनों दल सार्वजनिक तौर पर गठबंधन की मजबूती का दावा कर रहे हैं, लेकिन अंदरखाने चल रही बातचीत में कई पेच सामने आए हैं।
45 विधानसभा सीटों की मांग
सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस ने आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र DMK से 45 सीटों की मांग की है। यह मांग 2021 के मुकाबले काफी अधिक मानी जा रही है, क्योंकि उस चुनाव में कांग्रेस ने 25 सीटों पर ही चुनाव लड़ा था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस अपनी संगठनात्मक पकड़ और राष्ट्रीय उपस्थिति के आधार पर अधिक हिस्सेदारी चाहती है।
राज्यसभा सीट पर मतभेद
गठबंधन के भीतर एक और संवेदनशील मुद्दा राज्यसभा सीट को लेकर सामने आया है। खबर है कि DMK ने किसी उत्तर भारतीय चेहरे को राज्यसभा भेजने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया है। पार्टी का तर्क है कि तमिलनाडु से राज्यसभा प्रतिनिधित्व में क्षेत्रीय संतुलन और स्थानीय पहचान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
यह फैसला कांग्रेस खेमे में असहजता का कारण बना है, क्योंकि पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर संतुलन साधने की रणनीति पर काम कर रही है।
सत्ता में हिस्सेदारी पर भी ‘ना’
सूत्रों का यह भी कहना है कि DMK फिलहाल सरकार में कांग्रेस को अतिरिक्त सत्ता हिस्सेदारी देने के पक्ष में नहीं है। DMK नेतृत्व का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था गठबंधन धर्म के अनुरूप है और इसमें बदलाव की आवश्यकता नहीं है।
रिश्तों में गर्मजोशी, राजनीति में सख्ती
इन मतभेदों के बावजूद, मुख्यमंत्री स्टालिन और कांग्रेस नेता राहुल गांधी के बीच व्यक्तिगत रिश्ते बेहद सौहार्दपूर्ण बताए जाते हैं। दोनों नेताओं ने कई मंचों पर एक-दूसरे की सराहना की है और भाजपा विरोधी राजनीति में साझा रणनीति अपनाई है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि गठबंधन की राजनीति में इस तरह की बातचीत और दबाव सामान्य हैं। अंतिम फैसला चुनावी गणित, जमीनी सर्वे और राष्ट्रीय रणनीति को ध्यान में रखकर लिया जाएगा।
आगे क्या?
अब निगाहें दोनों दलों की औपचारिक बैठकों और सीट बंटवारे के अंतिम ऐलान पर टिकी हैं। यदि समझौता संतुलित फार्मूले पर होता है, तो तमिलनाडु में गठबंधन और मजबूत हो सकता है। लेकिन यदि मांगों पर सहमति नहीं बनती, तो यह भविष्य की राजनीतिक दिशा को प्रभावित कर सकता है।
फिलहाल, सियासी गलियारों में एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या दोस्ती की गर्मजोशी सीटों की सियासत पर भारी पड़ेगी
