परिसीमन पर सियासत तेज—सीएम रेवंत रेड्डी ने केंद्र पर लगाया दक्षिण भारत की अनदेखी का आरोप

दक्षिण भारत की राजनीति में एक बार फिर परिसीमन (Delimitation) का मुद्दा गरमा गया है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि मोदी सरकार दक्षिण भारतीय राज्यों के साथ राजनीतिक भेदभाव कर रही है और उनकी आवाज़ को राष्ट्रीय स्तर पर कमजोर करने की कोशिश कर रही है।

 

सीएम रेड्डी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया के बाद उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की लोकसभा सीटें इतनी बढ़ जाएंगी कि वे पूरे दक्षिण भारत से भी अधिक प्रतिनिधित्व हासिल कर लेंगे। ऐसे में दक्षिण भारतीय राज्यों की राजनीतिक भागीदारी और प्रभाव काफी कम हो जाएगा।

 

उन्होंने सवाल उठाया कि “अगर हमारी सीटें सीमित रह जाएंगी, तो राष्ट्रीय राजनीति में हमारी भूमिका क्या होगी? हमारा प्रतिनिधित्व कहां रहेगा?” उनका मानना है कि यह केवल सीटों का गणित नहीं, बल्कि संघीय ढांचे और क्षेत्रीय संतुलन का मुद्दा है।

 

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि यदि लोकसभा सीटों की कुल संख्या बढ़ाकर 815 कर दी जाती है, तब भी दक्षिण भारत की सीटें लगभग 150 के आसपास ही सीमित रह सकती हैं। इससे दक्षिण के राज्यों की राजनीतिक ताकत घटेगी और वे राष्ट्रीय निर्णयों में हाशिए पर चले जाएंगे।

उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पर आरोप लगाया कि वह दक्षिण भारत के मुद्दों को गंभीरता से नहीं लेती और नीति निर्माण में इस क्षेत्र को नजरअंदाज करती है। रेड्डी ने दक्षिण के सभी राज्यों से अपील की कि वे इस मुद्दे पर एकजुट होकर केंद्र सरकार की नीतियों का विरोध करें।

 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि परिसीमन का मुद्दा आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा केंद्र बन सकता है। यह केवल सीटों के पुनर्वितरण का मामला नहीं, बल्कि क्षेत्रीय असंतुलन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के भविष्य से भी जुड़ा हुआ है।

परिसीमन को लेकर उठ रही चिंताएं यह संकेत देती हैं कि भारत के संघीय ढांचे में संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। दक्षिण भारत के नेताओं की यह मांग है कि जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व तय करते समय क्षेत्रीय हितों और विकास के प्रयासों को भी ध्यान में रखा जाए।

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