उँगली पर स्याही का यह निशान यूँ ही नहीं,
इसमें मेरी ख़ामोश रज़ामंदी है, मेरा अधिकार है।
एक नाम, एक वोट, एक भरोसा –
लोकतंत्र में सबसे पहले इसी भरोसे को बचाना होगा।
सोचिए उस बुज़ुर्ग के बारे में, जो पिछले सत्तर वर्षों से हर चुनाव में अपनी उँगली पर स्याही का निशान लगवाता आया है। एक सुबह उसे पता चलता है कि मतदाता सूची में उसका नाम ही नहीं मिल रहा। उसके हाथ में काग़ज़ काँपता है और मन में एक सवाल उठता है—“क्या मैं अब भी इस देश का मतदाता हूँ?”
यह सवाल केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल है।
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) की प्रक्रिया और चुनावी तकनीक को लेकर उठ रहे सवाल केवल फ़ाइलों, आँकड़ों या सॉफ़्टवेयर तक सीमित नहीं हैं। ये उस विश्वास से जुड़े प्रश्न हैं, जिस पर हमारा लोकतंत्र टिका है। जब आम नागरिक के मन में अपने मताधिकार को लेकर आशंका पैदा होने लगती है, तो नुकसान किसी एक राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र का होता है।
इस चिंता का समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि तथ्यों, स्वतंत्र जाँच, सार्वजनिक ऑडिट और पारदर्शी जवाबदेही से ही संभव है। क्योंकि भरोसा नारों से नहीं, प्रमाण से कायम होता है।
लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है। लोकतंत्र उस भरोसे का नाम है, जिसके कारण एक सामान्य नागरिक यह विश्वास करता है कि मतदान केंद्र पर दिया गया उसका वोट उसकी अपनी आवाज़ है और उस आवाज़ के साथ कोई अन्याय नहीं होगा।
इसलिए जब मतदाता सूची, नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया तथा चुनावी व्यवस्था को संचालित करने वाले डिजिटल तंत्र पर गंभीर सवाल उठते हैं, तो उन्हें केवल किसी राजनीतिक दल और चुनाव आयोग के बीच का विवाद मानकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यह हर उस नागरिक का प्रश्न है, जिसका लोकतांत्रिक अधिकार मतदाता सूची में दर्ज उसके नाम से जुड़ा है।
द इंडियन एक्सप्रेस की एक जाँच-रिपोर्ट के अनुसार, पिछले लगभग दस महीनों के दौरान दो निर्वाचन आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—द्वारा विभिन्न चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर कम-से-कम 14 बार लिखित आपत्तियाँ दर्ज किए जाने की बात सामने आई। रिपोर्ट में नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने, फ़ॉर्म-6 में बदलाव तथा डिजिटल डेटाबेस तक पहुँच और उसके केंद्रीकरण से संबंधित सवालों का उल्लेख किया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ प्रस्तावित कदमों को लेकर गंभीर कानूनी और प्रशासनिक आपत्तियाँ भी दर्ज की गई थीं।
इन रिपोर्टों का उल्लेख किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि उन प्रश्नों की गंभीरता समझने के लिए आवश्यक है, जिनका उत्तर जनता के सामने आना चाहिए।
यदि चुनाव आयोग का पक्ष यह है कि महत्वपूर्ण निर्णय निर्धारित संस्थागत प्रक्रियाओं के तहत लिए गए और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से हुए, तो उन आपत्तियों का बिंदुवार उत्तर सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यदि आपत्तियाँ तथ्यों या नियमों के आधार पर उचित नहीं थीं, तो संबंधित दस्तावेज़ और स्पष्टीकरण सामने रखे जाएँ। यदि किसी प्रक्रिया में प्रशासनिक या तकनीकी कमी थी, तो उसे स्वीकार कर सुधार किया जाए।
पारदर्शिता का अर्थ केवल यह कहना नहीं है कि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ। इसका अर्थ यह भी है कि कौन-सा निर्णय किस नियम के तहत लिया गया, किसने आपत्ति दर्ज की और उस पर क्या कार्रवाई हुई—इन सभी प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर उपलब्ध हों।
आज मतदाता सूची केवल काग़ज़ पर दर्ज नामों का संग्रह नहीं है। यह एक व्यापक डिजिटल व्यवस्था से जुड़ी है। ऐसी स्थिति में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि तकनीकी प्रणालियाँ स्थानीय निर्वाचन अधिकारियों के वैधानिक अधिकारों और निर्णय लेने की क्षमता को सीमित न करें।
उपलब्ध रिपोर्ट में गोवा के 97 मतदाताओं का भी उल्लेख किया गया, जिनके संबंध में स्थानीय निर्वाचन अधिकारी ने उन्हें पात्र पाया था, लेकिन सॉफ़्टवेयर से जुड़ी समस्या के कारण उनके निर्णय दर्ज करने में बाधा आने की बात सामने आई।
यहाँ प्रश्न केवल संख्या का नहीं है। यदि एक भी पात्र नागरिक तकनीकी बाधा के कारण अपने मताधिकार से वंचित होता है, तो उस व्यवस्था की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
तकनीक चुनावी प्रक्रिया को सरल और तेज़ बना सकती है, लेकिन नागरिक के अधिकारों से जुड़े अंतिम निर्णय केवल किसी सॉफ़्टवेयर या एल्गोरिदम के भरोसे नहीं छोड़े जाने चाहिए। यदि किसी डिजिटल प्रणाली में किसी मतदाता के नाम पर आपत्ति दर्ज होती है, तो उसे यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि आपत्ति का आधार क्या है, जाँच किसने की और अंतिम निर्णय किस अधिकारी ने लिया।
इसलिए चुनावी सॉफ़्टवेयर और एआई-आधारित प्रणालियों के लिए स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट, स्पष्ट ऑडिट ट्रेल और जवाबदेही की व्यवस्था पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। जहाँ सार्वजनिक हित और निजता के बीच संतुलन बनाते हुए जानकारी साझा की जा सकती है, वहाँ पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
वर्ष 2023 में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और उनकी सेवा-शर्तों से संबंधित नया कानून बनाया गया था। इस कानून और नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर उस समय भी राजनीतिक असहमति और आपत्तियाँ सामने आई थीं।
जब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर उसके भीतर से ही गंभीर प्रश्न उठने की खबरें सामने आती हैं, तो नागरिकों के मन में संस्था की स्वतंत्रता और जवाबदेही को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यह प्रश्न किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि संस्थागत व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा है।
केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, इसलिए उस पर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए। संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा सवालों को दबाने से नहीं, बल्कि उनका तथ्यपूर्ण और पारदर्शी उत्तर देने से बढ़ती है।
चुनाव आयोग की सबसे बड़ी पूँजी जनता का विश्वास है। यदि इस विश्वास में दरार दिखाई दे रही है, तो उसका समाधान आलोचना को दबाने में नहीं, बल्कि तथ्यों को सार्वजनिक करने और आवश्यक सुधार करने में है।
मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन रखना निस्संदेह आवश्यक है। मृत व्यक्तियों के नाम, दोहराव वाली प्रविष्टियाँ और अन्य त्रुटियाँ दूर करना चुनावी व्यवस्था की जिम्मेदारी है। लेकिन सूची को शुद्ध बनाने की प्रक्रिया में किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हट जाना भी उतनी ही गंभीर समस्या है।
किसी बुज़ुर्ग का नाम सूची से गायब हो जाए, किसी महिला का नाम वर्षों तक मतदान करने के बाद अचानक न मिले, किसी मज़दूर के दूसरे शहर जाने के कारण उसका नाम पुराने और नए निर्वाचन क्षेत्र के बीच अटक जाए या किसी तकनीकी त्रुटि के कारण किसी मतदाता का पंजीकरण पूरा न हो पाए—तो यह केवल काग़ज़ी कार्यवाही की समस्या नहीं रहती। यह उसके लोकतांत्रिक अधिकार का प्रश्न बन जाती है।
इसलिए किसी मौजूदा मतदाता का नाम हटाने से पहले स्पष्ट सूचना देना, हटाने का कारण बताना, संबंधित व्यक्ति को अपनी बात रखने का अवसर देना और अपील का सरल रास्ता उपलब्ध कराना आवश्यक है।
चुनाव आयोग की निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत फ़ॉर्म-6 नए मतदाता के पंजीकरण, फ़ॉर्म-7 नाम हटाने के अनुरोध या आपत्ति तथा फ़ॉर्म-8 विवरण में सुधार और निवास स्थान बदलने से संबंधित कार्यों के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। इन प्रक्रियाओं की जानकारी सरल भाषा में देश के हर नागरिक तक पहुँचनी चाहिए।
यदि किसी पात्र नागरिक का नाम गलती से हट जाता है, तो उसकी बहाली के लिए समयबद्ध और सुलभ व्यवस्था भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
मतदाता सूची का प्रश्न किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। इसकी विश्वसनीयता सभी दलों, चुनाव अधिकारियों और नागरिकों के हित से जुड़ी है।
राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंट पहले से ही चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा हैं। उनकी भूमिका को मतदाता सूची के पुनरीक्षण, सत्यापन और आपत्तियों की प्रक्रिया में अधिक प्रभावी तथा पारदर्शी बनाया जा सकता है।
सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को समान अवसर मिलने चाहिए। नागरिक संस्थाएँ मतदाता जागरूकता अभियान चला सकती हैं और पात्र नागरिकों को अपने नाम की जाँच करने में मदद कर सकती हैं। यदि किसी क्षेत्र में असामान्य रूप से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने या जोड़े जाने का पैटर्न सामने आता है, तो उसके कारणों की स्वतंत्र जाँच की जानी चाहिए।
ऐसी व्यवस्था का उद्देश्य किसी एक राजनीतिक दल को लाभ पहुँचाना नहीं, बल्कि सभी पक्षों की निगरानी और जवाबदेही बढ़ाना होना चाहिए।
आख़िरकार चुनाव किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं, जनता का लोकतांत्रिक अधिकार है।
चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठने वाले सवालों के बीच एक महत्वपूर्ण बहस यह भी है कि क्या भारत में पारंपरिक बैलेट पेपर व्यवस्था को आधुनिक सुरक्षा उपायों के साथ फिर से अपनाने पर विचार किया जाना चाहिए।
यह सवाल राजनीतिक समर्थन या विरोध के आधार पर नहीं, बल्कि निष्पक्ष और तथ्यपरक समीक्षा के आधार पर देखा जाना चाहिए।
ईवीएम व्यवस्था के समर्थक इसकी गति, प्रशासनिक सुविधा और चुनावी प्रक्रिया में संभावित अनियमितताओं को रोकने की क्षमता पर ज़ोर देते हैं। वहीं, बैलेट पेपर के समर्थक मतपत्र की प्रत्यक्ष भौतिक मौजूदगी और मतगणना के पारंपरिक स्वरूप को अधिक सहजता से समझे जाने का तर्क देते हैं।
हालाँकि, बैलेट पेपर व्यवस्था की अपनी चुनौतियाँ भी रही हैं, जिनमें मतपत्रों की सुरक्षा, बूथ कब्ज़ाने की आशंका, अमान्य मतपत्र और मैन्युअल मतगणना में लगने वाला समय शामिल हैं। दूसरी ओर, ईवीएम व्यवस्था में तकनीकी सत्यापन, स्वतंत्र ऑडिट और नागरिकों के विश्वास को बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि ईवीएम हर परिस्थिति में सही है या बैलेट पेपर हर परिस्थिति में बेहतर है। वास्तविक प्रश्न यह है कि कौन-सी व्यवस्था मतदाता के अधिकारों की रक्षा, सुरक्षा, पारदर्शिता, स्वतंत्र सत्यापन, प्रशासनिक व्यवहार्यता और समयबद्ध मतगणना के बीच सबसे बेहतर संतुलन स्थापित करती है।
इस विषय पर स्वतंत्र विशेषज्ञों, राजनीतिक दलों, चुनाव अधिकारियों, तकनीकी विशेषज्ञों और नागरिक संगठनों की भागीदारी के साथ व्यापक सार्वजनिक विमर्श होना चाहिए।
यदि बैलेट पेपर व्यवस्था से संबंधित विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया जाता है, तो उसके संभावित लाभ, सीमाएँ, लागत और सुरक्षा संबंधी पहलुओं का तुलनात्मक अध्ययन सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यदि ईवीएम व्यवस्था जारी रहती है, तो वीवीपैट के सत्यापन, शिकायत निवारण और तकनीकी ऑडिट की प्रक्रियाओं को और अधिक पारदर्शी बनाने के विकल्पों पर भी विचार होना चाहिए।
लोकतंत्र में मशीन या काग़ज़ अपने आप में अंतिम लक्ष्य नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण है मतदाता का विश्वास।
ईवीएम के संबंध में दो बातों को अलग-अलग समझना आवश्यक है। किसी चुनाव में छेड़छाड़ का आरोप लगाया जाना और उस आरोप का प्रमाणित हो जाना एक ही बात नहीं है।
चुनाव आयोग ईवीएम और वीवीपैट के संबंध में विभिन्न तकनीकी एवं प्रशासनिक सुरक्षा उपायों की जानकारी देता है। इनमें मशीनों की प्रथम-स्तरीय जाँच, रैंडमाइजेशन, कमीशनिंग, मॉक पोल, स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा और निर्धारित प्रक्रिया के तहत वीवीपैट पर्चियों का सत्यापन शामिल हैं।
वर्तमान व्यवस्था में प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के पाँच यादृच्छिक मतदान केंद्रों की वीवीपैट पर्चियों का मिलान किया जाता है। निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं के तहत उम्मीदवारों को कुछ परिस्थितियों में वीवीपैट पर्चियों की गिनती का अनुरोध करने का विकल्प भी उपलब्ध है।
इन व्यवस्थाओं का होना महत्वपूर्ण है, लेकिन लोकतंत्र में केवल सुरक्षा उपायों का मौजूद होना ही पर्याप्त नहीं है। जनता को यह भी समझ में आना चाहिए कि ये उपाय किस प्रकार काम करते हैं, शिकायत आने पर जाँच कैसे होती है और उसके निष्कर्षों को किस सीमा तक सार्वजनिक किया जा सकता है।
जहाँ गंभीर और तथ्याधारित सवाल उठते हैं, वहाँ उनका उत्तर स्पष्ट प्रमाण, पारदर्शी प्रक्रिया और स्वतंत्र सत्यापन के माध्यम से दिया जाना चाहिए। इससे न केवल शिकायतों का समाधान होगा, बल्कि चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता भी मजबूत होगी।
आज आवश्यकता किसी व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध पहले से निर्णय सुनाने की नहीं, बल्कि निष्पक्ष और विश्वसनीय जाँच के माध्यम से तथ्यों को स्पष्ट करने की है।
यह जानना आवश्यक है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने की प्रक्रियाएँ किस प्रकार संचालित हुईं; डिजिटल प्रणालियों में किसे किस स्तर की पहुँच प्राप्त थी; फ़ॉर्म-6 में बदलाव किस आधार पर किए गए; निर्वाचन आयुक्तों द्वारा दर्ज आपत्तियों पर क्या विचार हुआ और जहाँ कोई त्रुटि पाई गई, वहाँ सुधार के लिए क्या कदम उठाए गए।
स्वतंत्र जाँच का उद्देश्य किसी को दोषी सिद्ध करना नहीं, बल्कि सच्चाई सामने लाना होना चाहिए। यदि व्यवस्था निर्धारित नियमों के अनुसार काम कर रही है, तो जाँच उसके पक्ष में तथ्य प्रस्तुत कर सकती है। यदि कहीं त्रुटि या अनियमितता हुई है, तो उसे सुधारने का रास्ता भी खुलेगा।
दोनों ही परिस्थितियों में सबसे बड़ा लाभ जनता का होगा।
इसी क्रम में चुनाव के बाद एक विस्तृत सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करने की व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है। इसमें बताया जाए कि कितने मतदाता जोड़े गए, कितने नाम हटाए गए, कितनी आपत्तियाँ प्राप्त हुईं, कितने नाम बहाल किए गए, कितनी तकनीकी शिकायतें आईं और कितने मामलों में सुधारात्मक कार्रवाई की गई।
यह जानकारी ऐसी भाषा में उपलब्ध होनी चाहिए, जिसे सामान्य नागरिक भी आसानी से समझ सके। लोकतंत्र केवल विशेषज्ञों और अधिकारियों की व्यवस्था नहीं है; यह नागरिकों की भागीदारी से मजबूत होता है।
आज चुनावी व्यवस्था को लेकर अलग-अलग विचार सामने आ रहे हैं। कोई ईवीएम पर भरोसा जताता है, कोई बैलेट पेपर की वापसी की माँग करता है, कोई वीवीपैट पर्चियों की अधिक व्यापक गिनती चाहता है और कोई मतदाता सूची की पारदर्शिता को सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा मानता है।
इन सभी बहसों के बीच एक साझा चिंता है—जनता अपने वोट को लेकर आश्वस्त होना चाहती है।
इसलिए आवश्यकता एक व्यापक राष्ट्रीय संवाद की है, जिसमें राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर चुनावी व्यवस्था की मजबूती पर चर्चा हो। ईवीएम और बैलेट पेपर की सुरक्षा, लागत, प्रशासनिक व्यवहार्यता, सत्यापन और पारदर्शिता का स्वतंत्र तुलनात्मक अध्ययन कराया जा सकता है।
यदि मौजूदा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है, तो उसे स्वीकार कर सुधार किया जाना चाहिए। यदि व्यवस्था के विरुद्ध लगाए गए आरोप तथ्यों से पुष्ट नहीं होते, तो जाँच के निष्कर्ष भी सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
हर आरोप को सच मान लेना उचित नहीं है, लेकिन हर शिकायत को राजनीतिक आरोप कहकर खारिज कर देना भी लोकतांत्रिक विश्वास को मजबूत नहीं करता।
सही रास्ता है—शिकायत हो तो जाँच हो, प्रमाण मिले तो कार्रवाई हो और आरोप प्रमाणित न हों तो उसके कारण भी स्पष्ट किए जाएँ।
लोकतंत्र का अर्थ केवल पाँच साल में एक बार मतदान करना नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ यह भरोसा भी है कि नागरिक का नाम मतदाता सूची में सुरक्षित रहेगा, उसे बिना उचित प्रक्रिया के उसके अधिकार से वंचित नहीं किया जाएगा, उसका वोट उसकी इच्छा के अनुसार दर्ज होगा और मतगणना निर्धारित नियमों के अनुसार होगी।
लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति केवल गलत निर्णय नहीं होती। उससे भी अधिक चिंताजनक वह स्थिति होती है, जब नागरिक सवाल पूछना छोड़ देता है या उसे यह महसूस होने लगता है कि उसकी शंका का कोई महत्व नहीं है।
इसलिए आज आवश्यकता शोर की नहीं, सजग नागरिक चेतना की है; आरोपों की पुनरावृत्ति की नहीं, तथ्यों की सार्वजनिक जाँच की है; और किसी को पहले से दोषी मान लेने की नहीं, ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें हर पदाधिकारी अपने निर्णयों के लिए जवाबदेह हो।
एक मज़दूर जो रोज़गार के लिए दूसरे शहर गया है, एक बेटी जो विवाह के बाद नए गाँव में आई है, एक बुज़ुर्ग महिला जिसके पास पुराने दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं हैं—इन सभी के लिए मताधिकार की प्रक्रिया सरल, सुलभ और न्यायपूर्ण होनी चाहिए।
इन लोगों के पास बड़े-बड़े तर्क नहीं होते। उनके पास बस एक वोट होता है और उस अधिकार को सुरक्षित रखने की उम्मीद होती है। उस उम्मीद को काग़ज़ी औपचारिकताओं, तकनीकी बाधाओं या जटिल प्रक्रियाओं के बीच खोने से बचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
चुनाव आयोग, सरकार और राजनीतिक दलों—सभी को याद रखना होगा कि लोकतंत्र में मतदाता केवल एक संख्या नहीं है। उसका अधिकार सर्वोपरि है और उसकी शंका दूर करना किसी पर एहसान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही का अनिवार्य हिस्सा है।
पारदर्शिता से किसी ऐसी व्यवस्था को डरने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, जो अपने निर्णयों को तथ्यों और नियमों के आधार पर सही साबित कर सकती है। खुली, निष्पक्ष और विश्वसनीय जाँच से ही जनता का भरोसा मजबूत होता है।
आइए, सवालों को दुश्मन नहीं, सुधार का अवसर मानें। चुनावी व्यवस्था ऐसी बने, जिसमें हर नागरिक बिना भय और संदेह के कह सके—
“मेरा नाम है, मेरी आवाज़ है और मेरा वोट सुरक्षित है।”
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे कीमती चीज़ केवल वोट नहीं, बल्कि वोट पर जनता का भरोसा है। इस भरोसे की रक्षा करना हम सबकी जिम्मेदारी है।
आभा चौधरी
लेखक कांग्रेस की नेता हैं।
