यूपी चुनाव से पहले कांग्रेस की सक्रियता बढ़ी, 150 से ज्यादा सीटों पर दावेदारी से सपा-कांग्रेस समीकरण पर चर्चा तेज

उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव में अब करीब एक साल से भी कम समय बचा है। ऐसे में प्रदेश की सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। इसी कड़ी में Rahul Gandhi के नेतृत्व वाली Indian National Congress राज्य में संगठन मजबूत करने और नए सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिशों में जुटी है।

संविधान सम्मेलन से दलितों को साधने की कोशिश

कांग्रेस पार्टी इन दिनों पूरे प्रदेश में संविधान सम्मेलन कार्यक्रम आयोजित कर रही है। पार्टी का उद्देश्य इन कार्यक्रमों के जरिए दलित समाज और संविधान से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक संवाद बढ़ाना है। पार्टी नेताओं का मानना है कि सामाजिक न्याय के मुद्दों को केंद्र में रखकर दलित और वंचित वर्गों को दोबारा कांग्रेस के साथ जोड़ा जा सकता है।

सूत्रों के मुताबिक, केरल और पश्चिम बंगाल के चुनावी कार्यक्रमों के बाद कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भी उत्तर प्रदेश में अपनी सक्रियता बढ़ा सकता है।

गठबंधन में 150 सीटों से कम मंजूर नहीं

सहारनपुर से सांसद Imran Masood ने स्पष्ट कहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस गठबंधन के तहत 150 से कम सीटों पर चुनाव लड़ने के पक्ष में नहीं है। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव के समय जो “80 और 17” का फॉर्मूला चला था, वह अब लागू नहीं होगा।

इमरान मसूद के मुताबिक, आज देश में राहुल गांधी सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं और दलित तथा अल्पसंख्यक वर्ग बड़ी उम्मीद के साथ कांग्रेस की ओर देख रहा है। ऐसे में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी चाहती है।

सीट बंटवारे पर पहले भी उठे सवाल

इससे पहले सीतापुर से सांसद Rakesh Rathore ने भी सीट बंटवारे को लेकर बयान दिया था। उनका कहना था कि 2017 में जब Samajwadi Party सत्ता में थी तब कांग्रेस ने गठबंधन में 105 सीटों पर चुनाव लड़ा था। अब जबकि सपा विपक्ष में है, तो सीटों का बंटवारा भी उसी आधार पर होना चाहिए।

राकेश राठौर का दावा था कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ आने से सपा को फायदा हुआ और उसकी सीटें बढ़ीं।

दलित वोट बैंक को लेकर रणनीति

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने बातचीत में कहा कि आज भी दलित समाज का एक बड़ा हिस्सा सपा पर पूरी तरह भरोसा नहीं करता। उनका कहना था कि दलित वोट कांग्रेस के बिना सपा के साथ पूरी तरह नहीं जाएगा। साथ ही कांग्रेस के साथ आने से सामान्य वर्ग का एक हिस्सा भी सपा के साथ जुड़ता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में गठबंधन का गणित हमेशा सीधा नहीं होता। अक्सर कहा जाता है कि राजनीति में 1 और 1 हमेशा 2 नहीं होते। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि सपा कांग्रेस की मांग के मुताबिक सीटें देने को तैयार होती है या नहीं।

आगे क्या?

आगामी महीनों में सीट बंटवारे और रणनीति को लेकर सपा-कांग्रेस के बीच बातचीत तेज होने की संभावना है। अगर कांग्रेस अपनी 150 सीटों की मांग पर कायम रहती है, तो गठबंधन की राजनीति और भी जटिल हो सकती है।

अब सबकी नजर इस बात पर है कि उत्तर प्रदेश में विपक्षी दल किस तरह का चुनावी समीकरण बनाते हैं और इसका मुकाबला सत्तारूढ़ Bharatiya Janata Party से कैसे किया जाएगा।

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